वो

मेरे सामने बैठी है वो,

जैसे शांत गंगा बहती है जो।

यूं ही अंदर ही अंदर सहती है वो,

मालूम है मुझे क्यों दुखी रहती है वो।


उसकी आंखों को पढ़ लेता हूं,

जैसे बिन बोले बहुत कहती है वो।

मेरी मजबूरी भी है इस कदर,

मेरी चुप्पी के अंदर रहती है वो।


मैं पूछ नहीं पाता कुछ उससे,

मुझसे खुद ही खुद कहती है वो।

और जब कुछ नहीं कहती वो,

तो लू की तरह बहती है वो।


मेरी भी मजबूरी बन आती है,

दूरी, औकात याद दिलाती है।

मैं काफी कुछ कर सकता हूं,

फिर भी, कुछ न करने को कहती है वो।


मुझसे इतना कुछ छुपाती है,

समेटकर मैं भी खुद अंजान बनता हूं।

वो हंसते हुए आंसू छुपाती है,

देखकर मैं भी खाली मकान बनता हूं।


यूं ही एक दिन दरिया की तरह बह जाएगी,

बिन कहे सब कुछ कह जाएगी।

मैं बैठूंगा उस दरिया के किनारे,

जिसमें मेरी कश्ती यूं ही ढह जाएगी।

                                                - शिनाख्त 

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