अधूरी प्यास
जगह जगह दिखते हैं, हमें हमसा दिखे न कोई। हम भी बैठे हैं अधूरे, हमें अधूरा दिखे न कोई। बाज़ार में बिक रही हैं चीज़ें हज़ारों, क्या कहिए कोई ख़रीद ले हमको, हमें ऐसा मिले न कोई। भीड़ रहती है हर जगह, लोग होते हैं हर पहर, कोई मिले बेवक़्त हमें, ऐसा हमें मिले न कोई। दिन तो काट ही लेते हैं, रात गुज़र ही जाती है, कोई न गुज़रे वो शख़्स, ऐसा हमें भी तो चाहे कोई। दिल की दीवारों को खंडहर किया, हमने ख़ुद को समंदर कर दिया। आए कोई प्यासा हमारी तरफ, हमारी भी प्यास को बुझाए कोई। –शिनाख्त