इश्क़, वक्त, काम और मैं
क्या ख़ूब वक़्त बिगाड़ा है, ख़ुद को जो इस तरह सँवारा है। हार कर इश्क़ में कुछ इस क़दर, मैंने जीत का एक रस्ता निकाला है। अब तन्हाई भी नहीं रही मेरे पास, इतना अकेला जो हो लिया हूं इस वक़्त तक पहुँचने के लिए बहुत सा वक़्त लगाया है। चंद दोस्त बाक़ी रह गए मेरे, कुछ दोस्तों से भी धोखा खाया है। इस उलटी सीधी दुनिया को देखकर परेशानी का असली मतलब आया है। ख़ुद को आगे बढ़ाने में रहती हैं कुछ दिक्कत हमने भी ख़ुद को पत्थरों से कई बार टकराया है। कितनों के जाने से कितनो को बुलाने से और उनके न वापस आने से हमने भी दिल को पत्थर बनाया है। वो मर गया जो था पहले ये कौन हूँ मैं, ये किसका साया है। अब न ख़ुशी है, न कोई ग़म का साया है। कुछ यादें हैं और काम बहुत ज़्यादा है। –शिनाख्त