ओझल
दिल टूटने के बाद दिल, दिल नहीं रहता,
समझदार हो जाता है, फिर नादान नहीं रहता।
कौन वफ़ा के काबिल, कौन बस गुज़रता बादल,
सबसे रिश्ता रहता है, पर कोई अपना नहीं रहता।
बस एक ठोकर मांगी थी ज़माने से कभी,
जो मिली इतनी मिली, अब कोई गिला नहीं रहता।
रात को किस हसीना को ख़्वाब में देखा था,
सुबह उठकर उन यादों का भी निशान नहीं रहता।
अब कौन आए इस दिल में दिया जलाने को,
खंडहरों में यूँ ही कोई मेहमान नहीं रहता।
रात भर लिखते रहे हम अपनी दास्तान,
सुबह होते ही खुद पर भी यक़ीन नहीं रहता।
- शिनाख्त
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