हिज़्र है लाइलाज

इश्क़ के मरीज़ का कोई इलाज नहीं,
टूटे दिल के लिए कोई साज़ नहीं।

तुम्हें लगता है, हो जाएगा इस बार कुछ,
कहाँ पहले कभी कुछ हुआ था?
तो आज भी, कोई इम्तियाज़ नहीं।

ये लाइलाज बीमारी है, दर्द-ए-दिल की,
दिल को उम्मीद है, पर किसी से आस नहीं।

कोई आकर भर दे ग़म,
खुद से तो, इसका कोई मयार नहीं।

प्यार, मजबूरी से माँगा जाए अगर,
इससे बड़ी, कोई मक्कार चाल नहीं।

बस खुद को बाहर से रखो, इतना सख़्त,
कि अंदर जलो भी, तो बाहर निकले आँच नहीं।

आख़िर में, बस रज़ामंदी बचती है,
इसे स्वीकार करने में, कोई हार नहीं।

न तुम्हारे हाथ कभी हल आया,
कितने आकर चले गए राँझे 
फिर भी रहा, इसका कोई हिसाब नहीं।

                                                      - शिनाख्त 

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