जीवन की कड़वी सच्चाई

Not a poem ...just random thoughts with poetry 

ख़ुद को बदलूँगा मैं कुछ इस तरह,
जैसे कोकून से बाहर आती है तितली जिस तरह।

लोग देखेंगे मेरे भीतर की ख़ूबसूरती
बाहर आते हुए।
अंदर से ऊँचा होकर
मैं पहाड़ बनूँगा बाहर जिस तरह।

दुनिया को समझाने के लिए
दुनिया जैसा बनना पड़ेगा।
जो बनना था, वह अपने लिए बन गया,
अब दुनिया को भी
मेरा कहा सुनना पड़ेगा।

लोग नहीं देख पाते अंदरूनी ख़ूबसूरती,
अब ख़ुद को सिर्फ़ रूहानी नहीं
जिस्मानी खूबसूरत भी बनना पड़ेगा 

मैं बदल भी रहा हूँ ख़ुद को,
अपने चुने हुए रास्ते पर
चलना पड़ेगा।

और चलते-चलते रास्ते पर मज़ा आ रहा है,
जैसे कोई ग़म
दिल से बाहर जा रहा है।

मैं इतना “हॉट” नहीं दिखता,
लेकिन ज़िंदगी में
यह भी काम करना पड़ेगा।

अंदर से ख़ुद को बुलंदी तक
ले जाना ही है,
बाहर भी कुछ कमाल
करना पड़ेगा।

ख़ुद को अंदर से भी,
बाहर से भी,
हर तरफ़ से
रंगना पड़ेगा।
           
                 –शिनाख्त 

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