bold इश्क

“कभी-कभी इश्क़ सिर्फ़ रूह में नहीं, जिस्म की हर नस में भी बोलता है। ये कविता उसी आवाज़ की है।”


खा जाऊँ तुझे पूरा का पूरा,

ना रहे कोई ख़्वाब अधूरा।

होठों पे रख दूँ अपने होठ,
तेरी साँसों को भर लूँ अंदर तक,
तु मुझमें डूबे,
और मैं तेरा जिस्म चखूँ—
मेरे इश्क़ के ख़ज़ाने का नशा पी ले।

ना रुक तू मुझसे लिपटने में,
ना मैं होश संभालूँ।
दो लताएँ जैसे लिपट जाती हैं एक-दूसरे को,
वैसे हम घुल जाएँ,
बीच में ना रहे कोई फ़ासला।

तेरे उभारों को निचोड़ता रहूँ,
तेरी गर्दन पे निशान छोड़ता रहूँ,
हाथों से तेरी कमर को खींच कर तोड़ लूँ अपनी गोद में।
और तू सिर्फ़ भागती न रहे,
मैं भी रुकता न रहूँ।

उँगलियों का एहसास,
सीने से चिपक कर ख़ुद को खोना,
और तेरे जिस्म का स्वाद लेना—
यही मेरा आज का नाश्ता है।

आज तेरे स्वाद से भरूँगा पेट,
तेरे पसीने से नशा पीऊँगा।
तू भागेगी नहीं,
और मैं रुकूँगा भी नहीं।

                                       - शिनाख्त 

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