सुकून और सब्र

किस क़दर उदासी छाई है,  

आज वो नहीं आई है।  

आई है तो बस उसकी याद,  

बताओ, इस क़दर बेवफ़ाई है।


तेरी यादों की बारात ही सही,  

उसकी आख़िरी मुलाक़ात ही सही।  

मेरे अंदर वो ज़हर का घूँट,  

तेरे अंदर की बात ही सही।


मेरी इच्छाओं का मरना अच्छा है,  

उन इच्छाओं की याद में एक नज़्म लिखी है।


कुछ कुर्सी का अंदाज हमें बहुत पसंद आता है

पर साथ में तालमेल नहीं बैठ पाता है


अब थोड़ा वक़्त दो उनको दफ़नाने को,  

थोड़ा वक़्त दो, आँसू आने को।  

थोड़ा जीभर कर रोने को ,  

फिर जीभर कर ख़ुश होने को।


ये वक़्त भी चला जाएगा,  

साथ में कुछ सबक़ लाएगा।  

बस कोई जल्दी नहीं है अब,  

सुकून लाने की भी जल्दबाज़ी नहीं अब।  

सब्र करना है मेरी क़िस्मत,  

और राज़ी है अब सब।

                                  – शिनाख्त 

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