धन्यवाद
जितने एहसान हैं मुझ पर लोगों के,
उतने तारे भी न होंगे इस आसमान में।
वक़्त-बेवक़्त उन्होंने जो साथ निभाया,
उसका हिसाब भी नहीं अब मेरी आन में।
कभी साथ देकर,
कभी साथ छोड़कर,
कभी सलाह देकर,
कभी डाँट बोलकर।
अगर ग़ौर से पूछूं ख़ुद से
कि मैं क्या हूँ —
तो आता है अंदर से एक जवाब:
कुछ नहीं, बस पानी का एक बुलबुला हूँ।
मेरे अंदर शायद मेरा कुछ हो भी,
लेकिन उस बनावट में लोगों का हाथ है।
मैं किस तरह कर लूं घमंड ख़ुद पर —
जो मिला है मुझे, उसमें सबका साथ है।
-शिनाख्त
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