दरिया और प्यासा
मैं जितना चाहता हूँ तुम्हें
मुझे तुम उतना नहीं चाहती,
बस यही बात मेरे दिल को
हर पल खूब सताती।
मैं तो दरिया हूँ,
प्यासे के इंतज़ार में बहता,
प्यार से भरी आँखें कोई देख ले
तो हर ज़ख्म को आराम से सहता
पर प्यासे के न आने से
दरिया कभी सूखते नहीं,
जो अपने सच में होते हैं,
वो दूर होते हैं पर छूटते नहीं।
जिसने जितना चाहा,
उसी में मैं खुश,
जितना भी मिला किसी से,
उसी में मैं संतुष्ट
किसी ने पलभर भी याद किया,
उसका आभार,
ज़माने में कौन मिलता है
दो पल के लिए भी बार-बार?
मिल जाए तो ऊपरवाले का
करूं मैं शुक्र हज़ार।
जो छूट गए पहले लोग
उनका कोई दोष नहीं
बस उनसे कोई मेल नहीं
जो बचे हैं मेरे पास वही मेरे सही
जैसे बर्फ से पानी और
उससे साफ पानी बनने में
कई चीजें छूट जाती है
पर जो बची रह जाती है
वो कमाल की होती है और
पानी और वो चीजें एक हो जाती हैं।
तुम न मिले तो कोई बात नहीं
लंबी है हम की शाम पर रात नहीं
और कोई मुझे मेरे जैसा मिल जाएगा
इसी उम्मीद पर कायम है मेरे हालात भी
– शिनाख्त
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