बलि
तुम्हें लगता है जो मिल गया है मुझे आसानी से
एक हिस्सा मैंने गवाया है खिलती अपनी जवानी से
वो इश्क़ था जो आँखों से बह रहा था
और तुम्हें लगता है लड़के रोते हैं बेइमानी से
तुम वाह-वाह करते हो सुनकर मेरी बातें
मैं किस ग़म से गुज़रता हूँ उन्हें कागज़ पर लाने से
खुद को बुलंद कर भी लिया और पा भी ली मंज़िल
एक उम्र बीत गई मेरी, खुद के ग़म को समझाने से
–शिनाख्त
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