कमबख्त दिल

कितनी बार टूटा ये दिल 
पर मरता क्यूँ नहीं 
इतनी बार पिघलता है ये 
आखिर संभलता क्यूँ नहीं 

क्या खोट है इसके अंदर 
क्या छुपा है इसके अंदर 
हर बार लगता है डर 
फिर भी ये डरता क्यूँ नहीं 

हर बार जब किसी को छोड़ता हूँ 
सोचता हूँ की इसके बगैर कैसे जी पाऊँगा 
खुद को नहीं समझा पाता हूँ कि 
कैसे इस गम को पी पाऊँगा 

पर पता नहीं क्या होता है इसे 
ये फिर धड़कता है 
ऐसा क्या मिल जात है कि 
फिर धहकता है 

पर अब थोड़ा इस पर काबू लाना है 
हर किसी के लिए नहीं खुद को पिघलाना है 
थोड़ा समय खुद पर लगाना है 
इस आंधी दौड़ से खुद को बचाना है 

                                                        -शिनाख्त 

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