Unsend letter
तुम्हें याद करता हूँ
तुम्हें याद करता हूँ,
बहुत याद करता हूँ।
तुम्हारी हर हँसी
अब क्यों मुझे रुलाती है?
तुम तो जा चुकी हो,
फिर ये कमबख़्त याद क्यों आती है?
तुम्हारा वो प्यार से
खाना खिलाना,
तुम्हारा वो ज़ोर से गले लगाना,
याद करता हूँ, बहुत याद करता हूँ।
मेरा खुद को न समझ पाना,
तुम्हारा मुझे समझाना।
ग़लती किसकी थी, पता नहीं,
फिर भी तुम्हारा मुझ पर हक़ जमाना।
मैं तो नासमझ था,
तुम तो समझदार थी।
मैं तो बावला था,
तुम तो होशियार थी।
मैंने खुद को समझा
तुम्हारे जाने के बाद।
अब खुद को सँवार भी लिया
तुम्हारी बातों के साथ।
तुम्हें कितनी बार याद करूँ?
यादों की सीडी को कितना रीवाइंड करूँ?
तुम्हें याद करके दुख होता है,
पर वही दुख यादों का सहारा भी बन जाता है।
मैं खुद को सँवार रहा हूँ,
खुद को आगे बढ़ा रहा हूँ।
तुम्हारी कही हर बात साबित करूँगा।
परवाना था, परिंदा बना, यूँ ही नहीं मरूँगा।
ये तुम्हारा प्यार ही था, जिसने मुझे हिम्मत दी।
तुम तो चली गईं, तुम्हारा प्यार रह गया।
बातें रह गईं, यादें रह गईं।
रह गया वो एहसास और एक आग रह गई।
तुम शायद इसे कभी न पढ़ो,
पर जब भी पढ़ो… याद रखना,
मैं मना करता था कि मैं तुम्हारे लिए नहीं लिखता।
सच ये था—मैं हमारे लिए लिखता था।
तुम्हें फ़ोन कर सकूँ,
ये मेरे बस की बात नहीं।
तुम्हारा नंबर भूल जाऊँ,
इतनी मेरी औक़ात नहीं।
तुम कहीं हो, मैं हूं कहीं
मिल जाएँगे चाहने वाले लाख हसीन।
लेकिन कैसे तुम्हारा शुक्रगुज़ार न रहूँ?
तुमने मुझे आईना दिखाया।
मैं तो बदलने की कोशिश कर रहा था,
अब वो आईना भी बदल दिया मैंने।
खुद को बुलंदियों के लिए तैयार कर लिया मैंने।
तुम आईना थीं…
शायद तुमसे कभी कह न पाया
कि मैं खुद को अच्छा नहीं मानता अंदर से।
मैं खुद को बुरा मानता हूँ,
खुद को बदलना चाहता हूँ।
लेकिन तुमने मेरे बुरे को हटाने की जगह
वही मुझ पर थोप दिया… अच्छा किया।
उस बुराई को मैंने जड़ से उखाड़ फेंका,
लेकिन उसमें तुम भी चली गईं।
हो सके तो मुझे माफ़ कर देना।
मैं खुद से जीतना चाहता था,
खुद को हराकर।
तुम इंसान सही थीं,
पर मुझे ग़लत समय पर मिलीं।
शायद यही तुम्हारा शुक्रगुज़ार रहूँगा—
या तो मिलते हम समझदारी से पहले,
या फिर समझदारी के बाद,
बीच में कभी नहीं…
–शिनाख्त
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