ये क्या है
जिस्म की भूख
मन की चाह
आँखों की ज़िद
होंठों की वाह
ये क्या है
तुम्हारी यादों के ज़ख़्म
तुम्हारी यादों के फूल
तुम्हारी बातों के काँटे
तुम्हारे जिस्म के उरूज
ये क्या है
तेरी आँखों का श्रृंगार
तेरे कानों की बालियाँ
तेरे वो गुलाबी होंठ
होंठों की बातें या उनकी लालियाँ
ये क्या है
बात-बात पर तेरा याद आना
जिस्म से भी तेरा एहसास जताना
सिर्फ़ रूहानी नहीं था जो भी था
ये है कैसा अजीब-सा फ़साना
ये क्या है
सिर्फ़ रूहानी एहसास नहीं
जिस्मानी भी सही
थोड़ा गुलज़ार
थोड़ा हासमी ही सही
ये क्या है
पता नहीं है ये क्या
क्या ये सिर्फ़ याद है
या यादों की राख है?
– शिनाख्त
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