KGF POEM

अग्नि के भय से ज्वलनशील,

खौलते, उबलते, बिखरे उल्कापिंड।। 

लहरें इंतज़ार कर रही हैं धरती चूमने के लिए,
सूरज इंतज़ार कर रहा है डूबने के लिए।
बिजली की बारात खड़ी है विद्रोह के लिए,
किस्मत भी काँप रही है 

अपने भविष्य के लिए।

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