याद

तुम्हें याद करता हूं 

और तुम्हारी बेइंतहा याद आती है ।

कैसे भी काट लेता हूं दिन 

ये कमबख्त नींद क्यूं नहीं आती है ।


क्या तुम्हें याद करना लाज़मी भी है ?

मेरा क्या ही हक बनता है !

तुम्हारे लिए मैं एक अच्छा दोस्त था,

मेरे लिए तुम मेरा ख्वाब बन गईं ।


हो तो काफी कुछ सकता था

मैंने उन बातों को कितनी बार 

बार बार ,हज़ार बार सोचा है 

पर एकतरफा कुछ नहीं होता ।


कभी कभी सोचता हूं 

क्या खुद के साथ बुरा किया 

या तुम्हारे साथ ज्यादा बुरा कर दिया 

जो मैं तुम्हारा दोस्त नहीं बन पाया।


कोई वादा भी नहीं कर सकता 

मेरे बस की बात नहीं है

ये यादें तुम्हारी रोक लूं 

इतनी मेरी औकात नहीं है


यादों को आने दो 

मुझे मेरा आईना दिखाने दो 

मरना नहीं है ,जीना है 

तेरी और यादों के लिए ।


मैं तुम्हें समझ पाया 

तुमने मुझे समझा 

ऐसा कौन मिलता है दुनिया में 

मुझे ये प्यार लगा , तुम्हें नहीं ।


इस रिश्ते को क्या छोड़ना अच्छा था ?

एक गम सताता है 

कौन मिल पाएगा ऐसा फिर ,

ये बात और दर्द बढ़ाता है।


जब हो मर्ज़ी चली आना 

ये दर हमेशा खुला रहेगा तुम्हारे लिए 

जब तक इस दर को तुम्हारे जैसा 

कोई और नहीं मिलता ।


A reminder song for both of us


उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो

न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए




Will be continued ...








Comments

Popular posts from this blog

A POOL OF SMALL WINS

Unfinished shorts

बदलाव