सपनों का गुलाम

हम क्या हैं 

हम कौन  हैं 

हम क्यूँ हैं जिंदा

हम मौन हैं । 


हैं कुछ हमारे सपने 

हम उनके गुलाम हैं 

अगर न मिलें वो सपने 

तो हम खुद में बदनाम हैं 


लोग बताते हैं 

लोग समझाते  हैं 

की ज़िंदगी सपनों से बड़ी है

अगर एक टूटा है सपना तो आगे बढ़ी है 


पर मैं नहीं समझता ये बात 

मैं तो तैयार हूँ , लड़ने हालात 


हार जीत दो बातें 

सपनें तो पूरे करने ही पड़ेंगे 

पैर कटेंगे , 

तब भी कदम चलने पड़ेंगे 


शायद मेरा सनम न मिले मुझे 

शायद मैं जैसा चाह रहा हूं न हो वैसे 

फिर भी न रुकूंगा मैं 

ज़िंदगी सफ़ल बना ही दूंगा मैं।


लगा दूंगा अपना पूरा दम 

और जब न मिले जो चाहा 

तो रहेगा गम । 

पर गम को भूल एक बार फिर लेगेंगे 

तब तक सांस हैं ये कदम और ये सपने न रुकेंगे । । 


                                                                          - शिनाख्त 


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