दूर रहो

तुझे खुद से बचाया है

इस दिल को कैसे मैंने समझाया है

मैं सूखा दूँ किसी को, सहरा हूँ

तू तो दरिया है, मुझे क्यों पाया है


मेरी हैवानियत का अंदाज़ा है मुझे

तू फूल सी नाज़ुक है

मैं फ़िक्र नहीं करता किसी को तोड़ने में

तू रब की इबादत है


तुझे खुद से दूर रखना है

बस इसी तरह तुझे बचना है

मैं तो आग हूँ आग, जला दूँ यूँ ही

तुझे क्यों बेवजह सुलगना है


मुझसे थोड़ा दूर रह लड़की

तू देख न पाएगी मुझे, डर लेगी

कोशिश भी मत कर मुझसे पास आने की

एक मुलाकात अपने सर लेगी


मैं तो बर्बाद रहकर आज़ाद हूँ

तू अपने पिंजरे में आबाद है

मैं खुश हूँ बुलंद हूँ

तू एक बेवजह छिड़कता साज़ है


मुझे मालूम है मेरी हक़ीक़त

अभी नहीं जानती तू मुझे

ग़लती से इश्क़ मत कर बैठ मुझसे

पूछेगी ज़माने से, क्या हो गया तुझे


मैं खुश हूँ

तू खुश है

क्यों अपनी खुशियों में आग लगाना चाहती है

तू क्यों मुझे अपनाना चाहती है


मुझे आज़ाद रहने दे

और भी थोड़ी बुलंदी सहने दे

एक आँसू भी ख़तरा है हुकूमत के लिए

मुझे ये सब अंदर ही कहने दे...

                                        –शिनाख्त 

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