खुद से मोहब्बत
ना मोहब्बत की तलाश है,
ना किसी के आने की आस है।
किसी को बुला लूँ अपनी तरफ़,
न कोई मेरे इतना पास है।
किसी के जाने से दुख हो,
ना किसी के जाने की आस है।
ये जैसी भी है ज़िंदगी मेरी,
मेरे लिए बहुत ख़ास है।
सच में बन गया हूँ मैं सितारा,
अब सबको मेरी ख़्वाहिश है।
पर दूर हूँ सबसे, जैसे कोई साज़ है,
अब दिल में दफ़्न कई राज़ हैं।
जैसा भी है, पसंद है मुझे,
अब न चाँद की आस है।
हो सकता है यूँ ही अधूरे हैं हम,
और कुछ इसी तरह पूरे हैं हम।
–शिनाख्त
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