क्या ढूँढता है

ज़ेहन कुछ सवाल ढूँढता है,

भीड़ में ज़िंदा मिसाल ढूँढता है।

आँखें देख लेती हैं लोगों के चेहरे,

बेज़ुबानों के अंदर की बात ढूँढता है।


अपने सीने की आग ढूँढता है,

ज़माने को जला दे, ऐसी राख ढूँढता है।

ख़ुद की पहचान में भटक कर,

यह ख़ुद ही की तलाश ढूँढता है।


सर बुलंदियों को देखता है,

मन उनके पार ढूँढता है।

मंज़िल से भी ऊपर हो कुछ,

ऐसा एक जहाँ ढूँढता है।


मन कुछ ख़्वाब ढूँढता है,

ज़िंदगी के कुछ राज़ ढूँढता है।

पढ़ता हूँ औरों के लिखे नग़मे,

दिल को छू जाए,

ऐसा ख़ुद का कलाम ढूँढता है।


ऐसा एक जहाँ ढूँढता है,

जहाँ न दोस्ती हो,

न प्यार हो।

रिश्तों से परे खड़ा,

कोई सख़्त-सा इम्तिहान ढूँढता है।


कभी दिल भी पागल था,

सिर्फ़ प्यार ढूँढता था।

अब प्यार से आगे जो राह जाती हो,

यह मन उसका मयार ढूँढता है।

इस प्यार-व्यार से कुछ ऊपर,

ऐसा एक संसार ढूँढता है।


                                     –शिनाख्त 

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