मेरा सफर

एक अजीब दौर से गुज़र गया हूँ
जो था पहले, अब मर गया हूँ।
रहता हूँ उसी घर में अब भी,
पर न जाने किधर गया हूँ।

नए सलीक़े से मिलता हूँ लोगों से,
वो ग़म-ए-हाल सुधर गया हूँ।
और जो कहने से भी डरते हैं लोग,
ख़ुद के साथ वही सब कर गया हूँ।

आज फिर याद आई है ख़ुद की,
आज फिर आँसुओं से भर गया हूँ।
जितनी सताती थीं मुझे परछाइयाँ,
अब उन्हीं परछाइयों से डर गया हूँ।

और सच कहूँ तो खुश हूँ मैं,
अर्सों बाद ख़ुद में घर गया हूँ।

                                     - शिनाख्त 

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