कुछ और भी

दिलों से आगे कुछ और भी हैं

ये ज़िंदगी प्यार से ज़्यादा कुछ और भी है,

और सिर्फ़ मोहब्बत ही इंसान को पागल कर दे

ऐसा नहीं —

मेरे पास ऐसे ख़याल कुछ और भी हैं।


जिस्म तो है पहला दरवाज़ा

सुकून के दरवाज़े और भी हैं,

जिस्मानी भूख तो होती है पूरी रोज 

ऐसा क्या है

जिसकी तमन्ना और भी है


ये चाहत, ये इश्क़, ये वफ़ा–बेवफ़ा, ये दुख

मेरे ज़ेहन में

इसके अलावा कुछ और भी है।


और सिर्फ़ मैं ही नहीं कहता ये बात

फ़ैज़ साहब के साथ 

कुछ लोग और भी हैं।


                                –शिनाख्त 

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