मेरी कलम

मैं लिख सकता हूँ काफ़ी

पर अब मन नहीं है,

सुना तो दूँ ये हाल-ए-दिल

पर अब कोई सनम नहीं है।


जो मिले हैं तुमसे मुझे इश्क़ में

दाग़ हैं दाग़, ज़ख़्म नहीं हैं।


जाने वो कौन लोग होंगे

जो समझते होंगे इंसान को इंसान,

यहाँ पर सब मुर्दे हैं

कोई हमदम नहीं है।


और मैं समझता हूँ

कि आप क्यों नहीं समझते,

दर्द को समझने के लिए दर्द जीना पड़ता है

इतना तो आप में दम नहीं है।


मेरा लहज़ा ही है जो कर रहा है इज़्ज़त

वरना लोगों में बात करने का ढंग नहीं है।


ख़ुद को कर लिया आज़ाद ख़ुद से इस तरह

ख़ुद के ख़यालों के ग़ुलाम, अब हम नहीं हैं, 

कर ली चीज़ें राज़ी ख़ुद में,

जो बह रही है वो है ज़िंदगी , कोई परचम नहीं है।


और ख़ुद के हिस्से में लिख ली बेफ़िक्री मैंने

कि मंज़िल मिले या न मिले ,ख़ुशी से रिश्ता अब कम नहीं है।

                                                              – शिनाख्त 

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