अलविदा

वो इश्क़ ही नहीं करती मुझसे ,

अब कोई मतलब नहीं है इन बातों का,

जिन आंखों में थे ख़्वाब कभी

क्यों बोझ बने अब उन रातों का।


हम अपना ढूँढे कोई और काम

ये इश्क़ नहीं है हमारे लिए, 

मेरे आँसू, मेरे लफ़्ज़, मेरी आवाज़

क्या मायने रखते हैं तुम्हारे लिए।


जब दिल इतना रो रहा है

तुम फिर भी नहीं आती सहारे लिए ,

और जब समझ ही नहीं पाई मेरी मोहब्बत

तो क्या था हक़ तुम्हारा हमारे लिए ।


मैं भूल जाऊँ तुम्हें, यही बेहतर है

तुम्हें याद रखना ख़तरा है अब हमारे लिए,

दर पर दस्तक तो दी हमने बहुत

पर खुला नहीं वो कभी हमारे लिए।


अब कोई शिकायत नहीं तुमसे

पर अब तुम नहीं रही कुछ हमारे लिए,

मेरे लिए तुम नहीं बची अब

जाओ, किसी और को ढूँढो अपने सहारे लिए।


हम परेशान नहीं करेंगे तुम्हें

चुप-चाप चले जाएँगे

एक आह भी न होगी तुम्हारी ज़िंदगी में

जैसे चला जाता है कोई किनारे लिए।


                                               –शिनाख्त 

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