जरूरी तो नहीं

हम जिसे चाहें पूरे दिल से 

वो भी हमसे दिल लगाए, ज़रूरी तो नहीं


हर किसी को पसंद आ जाऊँ मैं

इतनी सी भी ज़िंदगी की मजबूरी तो नहीं


बस चाहत है, कोई क़र्ज़ थोड़ी है

हर एक रिश्ता निभाए, ज़रूरी तो नहीं


जिससे मैं पसंद नहीं, उससे क्या गिला

हर दर पे सर झुकाए, ज़रूरी तो नहीं


हर कोई देख ले मेरे अंदर का शहर

हर राज़ यूँ ही दिखाए, ज़रूरी तो नहीं


ख़ुद को बचा के रखना भी एक हुनर है

हर बार ख़ुद को गँवाए, ज़रूरी तो नहीं


मिल जाए कोई जो गिले भी समझ ले

उससे पहले दिल पिघले, ज़रूरी तो नहीं ।

                                                     – शिनाख्त 

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