ख्वाहिश

ये सूरत ए हाल सँवर न जाए कहीं,

जो आए अब वो न जाए कहीं।


आती रहती हैं यादें उसकी,

फिर भी चाहता हूँ वो लौट कर आए नहीं।


दिल को भी मिलें कुछ दिन सुकून,

बेवजह कोई मेरा दिल दुखाए नहीं।


इतना सता लिया है लोगों ने बेवजह,

अब और कोई मुझे यूँ सताए नहीं।


अगर ग़म में हूँ, तो रहने दो,

मुझे मेरे भ्रम से निकाला जाए नहीं।


सोते हुए हँस दूँ अगर,

मुझे नींद से उठाया जाए नहीं।


काटने को बची है ज़िंदगी मेरी,

अब सच में कट न जाए कहीं।

                                       – शिनाख्त 

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