क्या लिखूं ?
कितने ज़ख्म लिखूँ,
कितनी परेशानियाँ लिखूँ,
खुद के बारे में जो भी लिखूँ,
हर पंक्ति में एक हैरानी लिखूँ।
अपनी ही गलतियाँ लिखूँ,
अपनी ही कमियाँ लिखूँ,
लिखूँ अपनी किताबें खुद में,
और तुम बताओ, मैं क्या लिखूँ।
रात भर की नींद लिखूँ,
या रात भर की परेशानियाँ लिखूँ,
अपनी गलतियों की सज़ा लिखूँ,
या अपनी गलतियों की गुमनामियाँ लिखूँ।
खुद की जीत लिखूँ,
या अपनी नाकामियाँ लिखूँ,
खुद की शराफ़त लिखूँ,
या ज़माने की बेमानियाँ लिखूँ।
फूलों का हार लिखूँ,
या सितारों की ख़ाक लिखूँ,
अपनी ही ज़िंदगी लिखूँ,
या एक हँसती हुई ज़िंदा लाश लिखूँ।
मैं चाहता हूँ लिखना बहुत,
पर अपने हाल पर और क्या लिखूँ।
दिल, दिमाग दोनों लिखकर खो दिए,
अब खुद का मैं क्या क्या लिखूँ।
ख़ैर, जब तक ज़िंदा हूँ,
चलता रहेगा ये कलम,
जिस दिन रुक जाए,
उस दिन अंतिम संस्कार लिखूँ।
–शिनाख्त
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