फरेबी ज़माना

अब किसके बारे में लिखें इस ज़माने में,

किसको हम बुरा कहें इस ज़माने में।


अब ऊँच-नीच का कोई पर्दा न रहा,

सब ही बुरे लगे हमें इस ज़माने में।


किस किस को परखें शक्ल से 

खुद की शक्ल बुरी लगी इस ज़माने में 


किस-किस को दें आवाज़ लौट आने की,

आवाज़ और प्यार जो खो गए इस ज़माने में।


एक भी शख़्स न मिला हमें दिल लगाने को,

यूँ ही जुदा रहे हम इस ज़माने में।


शायद हमारी भी कभी बात करेगा ये ज़माना,

अभी तो कोई बात नहीं करता इस ज़माने में।


किसी एक ने भी इश्क़ किया होता, तो क्या होता

बस हम शायर न होते इस ज़माने में।

                                                   –शिनाख्त 

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