वहम
तुम्हारी चीज़ों से तुमको पहचान लेता हूँ
अपने अंदर कुछ ऐसे वहम पाल लेता हूँ
हर किसी की निगाहों में तुम्हारी आँखें ढूँढता हूँ
हर किसी के चेहरे में तुम्हारी शक्ल पहचान लेता हूँ
शायद तुम गुज़रती रही हो मेरे आस-पास से
इस बात को अपना ही वहम मान लेता हूँ
मुझे इन बातों से ज़्यादा फ़र्क पड़ता रहा है
तुम्हें पड़ता होगा थोड़ा कम, यही बात ठान लेता हूँ
कई कोशिशों के बाद भी जान नहीं पाया एक इंसान को
आखिर मैं उसे एक अजनबी मान लेता हूँ
उसने दर्जा खो दिया है मेरे माशुक होने का
अब सारे वहम दिल से निकाल लेता हूं।
–शिनाख्त
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