बेशर्त प्यार का ख्वाब
ज़िंदगी में कभी भी बेशर्त प्यार नहीं मिलता, और जब इंसान कोई ये कमी महसूस होती है तो वो खुद को हमेशा अधूरा ही पाता है। इस मर्ज का कोई इलाज़ नहीं है, बस ये बात अपना ली जाए कि ज़िंदगी में ऐसा ही होता है, यही कटु सत्य है । क्या हम किसी को आज तक बेशर्त प्यार दे पाए हैं ? क्या हम किसी से खुलकर बात कर पाएं हैं ?
इसलिए बातें करना बहुत ज़रूरी है ।
ये एक आदर्श बात है कि बेशर्त प्यार मिल जाए , पर फिर भी गहरा प्यार तो है ही, थोड़ा खुश रखने वाला प्यार तो है ही।
खुद को अधूरा महसूस करने वाले जब शायरों से मिलते हैं तो खुद को थोड़ा सहज महसूस करते हैं । क्योंकि एक अधूरे को हमेशा दूसरा अधूरा ही समझ सकता है।
ख़ैर एक कविता लिखने की कोशिश की मैने इस बात पर ।
एक चाँद को पीछे छोड़ आया,
अपने घर को ख़ुद ही तोड़ आया।
रास्ते में मिला था एक बच्चा,
उसके लिए मैं तारे तोड़ आया।
एक मोहब्बत से क्या टूटे हम,
हर दिल्लगी को पीछे छोड़ आया।
रास्तों में अक्सर मिलते हैं चौराहे,
मेरी ज़िंदगी में बस एक मोड़ आया।
किन अपनों से कहूँ खुलकर अब मैं,
दिल में ख़ामोशी का निचोड़ आया।
अब क्या मतलब रहा ज़माने से,
मैं गुल्लक से कुछ दोस्त जोड़ आया।
जब माँ-बाप ही गिना रहे थे एहसान अपने,
मैं बेशर्त प्यार का ख़्वाब छोड़ आया।
– शिनाख्त
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