ईमानदारी
कितने झूठ खुद से बोले थे,
कितनों को समझाया था।
जब खुद से बस एक सच कहा,
पूरा जीवन याद आया था।
अब नहीं लड़ता मैं किसी से,
दरिया सा बस बहता हूं।
अब खुद से सिर्फ सच कहता हूं,
इसके अलावा कुछ नहीं कहता हूं।
लोगों से अब क्या उम्मीद करूं,
जब खुद में ही मशरूफ रहता हूं।
अपनी गलतियां खुद सुधारता हूं,
और खुद को ही बस सहता हूं।
Comments
Post a Comment