दिन रात

तुम्हारी शिकायत खुद से करते हैं दिन-रात  

खुद से खुद ही बातें करते हैं दिन-रात  


तुम्हारी शिकायतें तुम्हें बैठ कर सुनाना चाहता हूँ  

बस इसलिए तुमको याद करते हैं दिन-रात  


पूछती थी कि कहाँ से लिखते हो ये सब  

अब तुम्हारा ही ज़िक्र करते हैं दिन-रात  


ये जो वक़्त गुज़र रहा है धीमे-धीमे  

तुम्हारी यादों पर धूल चढ़ा रहा है दिन-रात  


अब मैं भी मशरूफ़ रहता हूँ खुद में यूँ ही  

अब खुशी से अकेले कट रही है ज़िंदगी दिन-रात

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