इश्क की चोट

जितनी थी, सबसे इश्क़ किया मैंने  

अपने सर बस ये इल्ज़ाम लिया मैंने  


जो कर न पाती मुझको प्यार लौटकर  

सिर्फ उन्हीं को क्यों दिल दिया मैंने  


अब सोचता हूँ तो याद आती है  

पर किसकी याद आती है, यही दर्द लिया मैंने  


अब याद उसकी नहीं आती, याद तन्हाई की है  

जो न गुज़रा था वक़्त मुझ पर, वही गुज़ार दिया मैंने  


अपनी तन्हाई भी अपनी नहीं लगती  

उधारी का ये सौदा बेवजह लिया मैंने  


दिल के टुकड़े बिसात में बिछाए बैठे हैं 

इस तरह अपने दिल को सफ़ा किया मैंने  


अकेले रहना भी एक कला है  

उस कला के लिए क्यों लहू दिया मैंने

                                                       - शिनाख्त 

Comments

Popular posts from this blog

Unfinished shorts

Current thoughts

लापता