औरों का नजरिया
काँटे भी नहीं चुभते, इतनी मोटी खाल हुई
दुनिया की हर ठोकर अब जैसे बेहाल हुई
बातें सबकी चुभती हैं, ये सच मैंने माना है
अपने जब कुछ कह जाएँ, रूह तलक बवाल हुई
राहों में काँटे थे इतने, चलना भी दुश्वार हुआ
फिर भी लोगों को हममें बस कमियाँ बेहिसाब हुईं
दुनिया जीतोगे तुम सिकंदर जैसे बनकर
अपने ही ना जीत सकोगे तो फिर ये जीत हार हुई
घर की मुर्गी दाल बराबर, कहते सब आसान बहुत
सोचा है कि उस मुर्गी की क्या गलत बात हुई
ना तारीफ़ों में खो जाना, ना शिकवों में जल जाना
काम पे ध्यान रखा जिसने, उसकी ही पहचान हुई
ये बातें भी धुंधलाएँगी, ये पल भी गुज़र जाएगा
वक़्त के आगे हर गहरी तकलीफ़ थकान हुई
औरों का क्या है, वो तो अपना चश्मा लेकर चलते हैं
खुद को खो बैठे जो इंसाँ, बस उसकी ही हार हुई
- शिनाख्त
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