पुराने ज़ख्म

भरे हुए ज़ख्म आज भी दहकते हैं,

यूँ तो पत्थर हुआ दिल, पर हम आज भी बहकते हैं।


और मैंने हँसते-हँसते जाने दिया था उसे,

मेरे गरम अश्क आज भी चहकते हैं।


सोचा था माफ़ करने पर भूल जाऊँगा उसे,

ये क्षमा के फूल कुचलने पर भी महकते हैं।


दिल तो दिल है, डरता है ठोकर खाने से,

ये तो हिम्मत है, फिर दरिया में उतरते हैं।


इश्क़ के दरिया में डूबने में डर कैसा,

ये तो मेरे जज़्बात हैं जो साहिलों से सिहरते हैं।


अब जिसको रहना हो, वो वहाँ रहे,

हम भी अब खुद में ही ठहरते हैं।

                                             – शिनाख्त 

Comments

Popular posts from this blog

Unfinished shorts

Current thoughts

लापता