मोहब्बत से मायूसी

मुझे इश्क़ चाहिए,

कैसा है वो, बताऊँगा।

ये ज़माना बड़ा मक्कार है,

कैसे उसे समझाऊँगा।


मुझे इश्क़ शायद मिलने वाला नहीं,

शायद यूँ ही उम्र गुज़र जाएगी।

पर दिल की इस ख़्वाहिश को,

कौन भला समझाएगी?


क्योंकि चाहिए मोहब्बत,

दिल्लगी नहीं।

चाहिए कोई हाल पूछने वाला,

चाहिए कोई ख़याल रखने वाला।


चाहिए कोई ख़ास अपना,

जो हर मोड़ पर साथ निभाए।

चाहिए कोई अपना ऐसा,

जो हर दर्द में पास नज़र आए।


पर अफ़सोस,

ये ज़माना बड़ा है मक्कार।

यहाँ लड़की मिलती बस उधार,

हर किसी का है घर बाज़ार।

कुछ दिन रखे लोग दिल्लगी,

बाकी दिन और नए यार।


यहाँ लोग मोहब्बत कम,

और मतलब ज़्यादा रखते हैं।

कुछ दिन दिल से खेलते हैं,

फिर नए यार ढूँढ़ लेते हैं।


कुछ सिर्फ़ दिल्लगी करते हैं,

मोहब्बत का नाम लगाकर।

कुछ झूठे वादे करते हैं,

दिल को ख़्वाब दिखाकर।


कुछ हुस्न से दीवाना बनाकर,

दिल का सुकून छीन लेते हैं।

और फिर मोहब्बत के बदले,

अपने मतलब गिन लेते हैं।


कुछ कहते हैं,

"तुम बहुत अच्छे हो,

पर मैं तुम्हारे लायक नहीं।"


कुछ कहते हैं,

"तुम बहुत सच्चे हो,

पर तुम हमारे नायक नहीं।"


मुझे चिढ़ सी हो चुकी है,

उस प्यार के नाम से,

जिसका मज़ाक बना रखा है

इस ज़माने ने।


हर कोई दिलों की बात करता है,

पर मोहब्बत आज भी

चेहरे से ही शुरू होती ज़माने में।


अब मुझे नफ़रत सी है इश्क़ से,

पर दिल की फ़ितरत भी अजीब है।

हर बार टूटकर भी,

किसी अपने को ढूँढ़ता है।


अब मुझे नफ़रत है इश्क़ से,

जैसा ग़ुस्सा अंदर रखा है कोई।

कितना भी चिल्ला ले ये दिल,

पर दिल अब भी चाहता है कोई।

                                       –शिनाख्त 

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