आज कल दुनिया

सब ग़म के हैं मारे यहाँ पे

फिरते हैं सब बेचारे यहाँ पे


हैं सब ग़म के सहारे यहाँ पे

नहीं हैं ग़म में सहारे यहाँ पे


मैं जो छोड़ आया हूँ ग़म को पीछे

बैठा हूँ लेकर इतने सितारे यहाँ पे


अकेले और खुश एक साथ कैसे रहते हैं

जैसे गर्म नदी के ठंडे किनारे यहाँ पे


इश्क़, ख़ानदान, समाज और तुम ख़ुद

हर तरफ़ हैं तुम्हारी दीवारें यहाँ पे


देख लेना जिसको भी चाहो हमेशा

सहरा भी हैं और बंजारे यहाँ पे

                                           – शिनाख्त 

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