दर्द–ए–दिल
बस मन लगता है अपने काम में पर दिल नहीं लगता किसी भी इंसान में। किस तरह कटेगी ज़िंदगी, सिर्फ़ थोड़े काम में, थोड़े आराम में। ये दिल अब थक गया है दरों पर दस्तक देते-देते, थोड़ा कहीं ठहरे — तो कुछ बात बने। बस एक मन बचा है जिसने पाया है खुद को, उस मन की ख़ुशी में थोड़ा आराम मिले। ज़िंदगी दरिया बन गई, दिल डूब गया, मुझे मेरा मन मिला — वक़्त खूब गया। अब इंतज़ार रहेगा एक उम्र भर, इस दिल को भी कोई किनारा मिले। पुराने घाव अभी भी दर्द देते हैं, कभी उनको भी कोई सहारा मिले। – शिनाख्त