मैंने क्या देखा
थोड़ी दुनिया देखी , थोड़ा दुनिया जहां देखा कभी जमीन देखी कभी आसमाँ देखा देखी कई इमारतें इन आँखों ने पर कभी न अपना मकान देखा चंद लम्हों का साथ देखा चलते हाथों में हाथ देखा पर कभी न देखा ऐसा वक्त हमेशा जब सूरज और दरिया को एक साथ देखा कुछ सवालों का जवाब देखा कुछ सवालों का मलाल देखा देखा परेशान होते हुए भी खुद को पर हमेशा वक्त का कमाल देखा अच्छा वक्त का आराम देखा बुरे वक्त का हे राम देखा चलता रहा मैं दरिया के किनारे कभी न खुद को विराम देखा - शिनाख्त