तुम्हें भूल जाऊँ या तुम्हें भुला दूँ, इस दर्द की क्या खुद को मैं कितनी सज़ा दूँ। लगा दूँ आग इस दिल में, जला डालूँ वो तेरी यादें, कुछ तो करूँ मैं यूँ बेचैन, कहीं इस आग में खुद को न जला दूँ। कहीं से चलूँ, कहीं तो ठहरूँ, रात की नींद को कभी तो पहनूँ। पर सच्चाई ये है — मुझे भी कोई मिल जाएगा, दिल दोबारा से खुद को ज़िंदा पाएगा, आएगा दिल धड़कने का सबब याद, पर वो तुझे याद न लाएगा। तू मुझे पूरी तरह समझती थी, ये झूठ था या फिर आधा सच, क्योंकि तू मेरा दिल न समझ पाई, और बस यही तक कहानी आज याद आई। - शिनाख्त