क्या नया ?

जैसी भी हों बातें, आख़िर बातें ही तो हैं,
कितनी भी लंबी हों, आखिर रातें ही तो हैं।

कौन गया, कौन आया, क्या खोया, क्या पाया,
गुज़रे वक़्त की सब यादें ही तो हैं।

ऐसा नया क्या है जो मैं देख लूँगा,
मेरी भी तुम्हारी जैसी आँखें ही तो हैं।

पता नहीं हर वक़्त क्या ढूँढ़ता रहता हूँ,
आख़िर में सब एक जैसी चाहें ही तो हैं।

शहर का हर कोना घूम लिया है मैंने,
आख़िर में सब एक जैसी राहें ही तो हैं।

कब ख़त्म हो जाए ये ज़िंदगी, क्या मालूम,
अभी तो बची हुई कुछ साँसें ही तो हैं।

— शिनाख्त 

                                               

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