Fasla 2
किसी के पीछे भागता चला मैं,
ख़ुद को हमेशा कम आँकता चला मैं।
ज़ेहन की हर बात की गवाही माँगी उससे,
फिर भी अपने हाथों को काँपता चला मैं।
जब देखा तो किसी बात का सबूत न मिला,
दिमाग़ की बातों को यूँ काटता चला मैं।
अपनी ही बातों पर अपना सर खोता रहा,
ख़ुद को बिना वजह डाँटता चला मैं।
अब सब छोड़ कर कुछ हिस्से सच के देख लिए,
अब ख़ुद के लिए खुशियाँ बाँटता चला मैं।
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