क्या कहें ?

कभी मैं कह नहीं पाता हूँ 
और कभी मैं सह नहीं पाता हूँ। 

इस बोझ को उतारने के लिए 
मैं लिखता चला जाता हूँ। 

अपने ही सबसे करीब हैं और
अपनों से ही डरता रह जाता हूँ।

और कोई क्या बोलेंगे इससे क्या फरक मुझे 
पर अपनों की बातें सोचकर दिल दुखाता हूँ। 

बाकी सबके नज़रों में खुलकर कहता हूँ 
अपनों की नज़रों में चुप रह जाता हूँ। 

पुराने जख्मों को बीते एक अरसा हुआ 
फिर भी क्यूँ आज उनसे डर जाता  हूँ 

वैसे तो अच्छा सोचता हूँ काफी 
पर कभी कभी अपनी ही सोच से घबराता हूँ। 

ये कैसा अजीब रोग है मेरा 
पूरे के चक्कर में अपना आधा भी गवांता हूँ। 

- शिनाख्त 

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