मैं कौन हूं ?
I don't know what it is...just my thoughts
सच बात तो ये है,
मुझे भी नहीं पता मैं कौन हूँ।
जहाँ बोलना हो, वहाँ चुप हो जाता हूँ।
जहाँ चुप रहना हो, वहाँ हँस जाता हूँ।
कभी सब कुछ समझकर भी कह नहीं पाता,
कभी कहता हूँ तो शब्द कम पड़ जाते हैं।
कभी ग़ज़लों में रहता हूँ,
कभी देश के हालात देखता हूँ।
कभी दोस्तों के साथ हँसी-मज़ाक,
कभी ख़ुद के साथ बिल्कुल चुप।
कभी ख़ुद के साथ मज़े,
कभी दोस्तों से चुप।
कभी सब कुछ जानने को आतुर,
कभी कुछ भी सुनने को नहीं तैयार।
कभी प्यार को पंछी,
तो कभी गुनाहों का देवता।
कभी सबकुछ समझने-समझाने वाला,
कभी ख़ुद में उलझकर रह जाने वाला।
अब इतनी-सी छोटी उम्र में
क्या-क्या कर लूँ?
लोग कैसे कर लेते हैं इतने बड़े काम पता नहीं
लेकिन मैं सच्चा रहकर अपना काम करता हूँ
लगता है कि उन्हें भी नहीं पता होगा काम छोटा है या बड़ा
बस वो काम करते हैं और मैं भी काम ही करता हूं बस
शायद मुझे पता है मैं कैसा हूँ,
पर इन सब में असली मैं कौन हूँ, पता नहीं।
इसलिए ख़ुद का नाम "शिनाख़्त" रखा है।
असल नाम नहीं है...
पर ख़ुद की शिनाख़्त है।
मिला है जवाब कि ये सब मैं ही हूँ।
ये पहचान ढूँढ़ना ही तो पहचान है मेरी।
हर इंसान में होते हैं कई इंसान,
और वो इंसान उन एहसासों से मिलकर बना है।
हर इंसान ऐसा ही महसूस करता है,
बस फ़र्क़ ये है कि हर इंसान
कभी इतना बोल नहीं पाता।
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