अब फ़र्क नहीं पड़ता

नहीं चाहिए अब तारीफ़, जैसा भी हूँ, ठीक ही हूँ।

थोड़ी-बहुत दिक्कतें हैं, उन्हें भी खुद ही पूरा कर लूँगा।

आपसे न कोई झगड़ा है, न कोई बहस।

आपकी राय, आपकी तारीफ़, आपकी डाँट, आपकी बेइज़्ज़ती... सब आपकी है, मैं उन्हें अपना क्यों मानूँ?

कोई तो होगा, आज, कल, या शायद कभी।

और अगर कोई न भी हुआ, तो मैं खुद से सच्चा हूँ।

पहले पड़ता था फ़र्क, हर तारीफ़ का, हर ताने का। क्योंकि मैं खुद को जानता ही नहीं था।

इतने चेहरे मिले, इतनी आवाज़ें सुनीं, इतने सच बताए गए, कि एक दिन सच की शक्ल ही धुंधली पड़ गई।

तब समझ आया, हर किसी का सच मेरा सच नहीं होता।

अब रत्ती भर फ़र्क नहीं पड़ता।

कोई साथ चले, तो अच्छा।

कोई न चले, तो भी मैं अपने साथ चल दूँगा।

आज़ाद तो आज हुआ हूँ, दुनिया से नहीं, अपनी ही सोच की कैद से।

अब समझ आया, ज़ंजीरें लोहे की नहीं थीं, दूसरों की राय की थीं।

पता नहीं लोग सच बोलते थे, या झूठ को सफ़ेद रंग से रंग देते थे।

अब आपके ताने और आपकी तारीफ़ें, दोनों एक-सी लगती हैं।

क्योंकि अब जो भी करता हूँ, दिल से करता हूँ।

काम को अपना समझकर करता हूँ, सिर्फ़ काम समझकर नहीं।

अब मंज़िल से पहले खुद को पा लिया है, इसलिए रास्ते आसान लगने लगे हैं।

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