वक्त हमारा भी आएगा

हम भी चुप बैठे हैं इंतज़ार में,
हो चाहे अंतिम अभी कतार में।

खरीद लाएँगे वक़्त अपना भी,
हो कितने भी खरीददार बाज़ार में।

बताएँगे सबको क्या-क्या झेला है,
कैसे सस्ते बिके थे महँगे संसार में।

किसी ने छोड़ा साथ बीच में तो क्या,
हमने संभाला था ख़ुद को मझधार में।

अभी खड़े हो मेरे साथ जो भी,
हम खड़े थे अकेले अपनी हार में।

ख़ुद को ले जाएँगे बुलंदियों तक,
जब तक चेहरा न छपे इश्तिहार में।

सर झुकाकर काम करते रहे हम 
कभी नहीं थे सहमत आपके विचार में।

वो मुश्किल समय था, इसलिए कुछ बोले नहीं,
अब बोलेंगे खुलकर अपने विचार में।

हम नहीं चलते आपके हिसाब से,
हम रहते हैं अपनी ही रफ़्तार में।

हम तो मिलेंगे केदारनाथ तुमको,
तुम ढूंढते रह जाओगे हमें हरिद्वार में।

- शिनाख्त 

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