सवाल
जैसे भूत का कोई साया है मुझपे
इन सवालों ने एक सितम ढाया है मुझपे
इन सवालों ने एक सितम ढाया है मुझपे
हर सवाल का जवाब हर समय नहीं होता है
नए जवाबों ने नया जाल उलझाया है मुझपे
ज़िंदगी उलझती रही किताबों में
अभी कहां कोई इल्म आया है मुझपे
जो दिल में होता है, उसे लबों तक लाता हूं
कलम ने क्या नहीं बिताया है मुझपे
एक अरसे से बैठा हूं लेकर अपनी जिद् मैं
अभी तो किस्मत का बहुत बकाया है मुझपे
ऐसे कैसे चला जाऊंगा खाली हाथ अभी
अभी तो ज़िंदगी का किराया है मुझपे
खुद को बर्बाद करूंगा तो बस खुद के लिए
यूं तो बर्बादी ने हर दांव आज़माया है मुझपे
- शिनाख्त
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