हमदर्दी

जज़्बातों की यहां किसे पड़ी है
सबको चाहिए बस एक महंगी घड़ी है।

छोटी छोटी बातें ज़रूरी हैं समझने को
बड़ी बातों के लिए दुनिया बहुत बड़ी है

ऐसी रातों में किसे कहें परछाई अपनी
वो जो पीछे है या जो सामने खड़ी है

ये दिल्लगी भी अजीब माशूका है
पहले देखा भी नहीं अब हाथ धोकर पीछे पड़ी है

मैं वफ़ा की बात करता रहा , वो हंसती रही
ये लड़की आखिर कैसे पली-बड़ी है

वो जो डर रहा है बीमारी और इलाज से
दवाई से ज्यादा उसे खर्च की पड़ी है

ख़याल रखो इस किराए के मंदिर का
इसकी हिफ़ाज़त इबादत से भी बड़ी है।

वो घबराया हुआ है असली दुनिया देखकर
इसलिए उसपर सवालों की एक झड़ी है

कितनी भी कर लो कोशिश काबू करने की
आती नहीं समझ ये ज़िन्दगी बड़ी नक्चड़ी है

- शिनाख्त

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