एक अजीब गजल

क्या पता कैसे शायरी लिखा करते हैं 
हम तो बस इस दिल की दवा करते हैं 

कहीं गहरा दरिया कहीं खामोश पहाड़ 
हम बस इसी शांति से वफ़ा करते हैं 

आए जो कभी तेरे याद हमें तनहाई में 
खुद को तेरे पास जाने से मना करते हैं 

कभी जो मिल बैठे मेरे गम मेरे साथ 
हम भी गुज़री यादों के साथ मज़ा करते हैं
 
अब जो आई हो तुम चाँद बनकर 
हमारे दिल में भी चार चाँद सजा करते हैं
 
कभी अकेले भी गुजारना पड़ता है वक्त 
हम खुद से भी खुदकी निभा करते हैं 

मकान तो तमाम है शहर में पर घर नहीं 
इसलिए हम बंजारों की तरह फिरा करते हैं

- शिनाख्त 

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