गरीबी और डर
हर वक्त डरते रहना
किसी न किसी से डरते रहना
क्या ये बचेगा
या ये भी चला जाएगा
क्या मेरे फैसले कोई और लेगा
क्या मुझ पर खुद के लिए भी पैसे नहीं होंगे
क्या एक हल्का सा खर्च भी
काँटों की तरह चुभेगा
क्या इस चीज़ को फिर से खरीद पाऊँगा
क्या इसी तरह ज़िंदगी गुज़ार दूँगा
क्या किसी महँगी चीज़ को देखकर
बस अपने पैसे ही गिनते रह जाऊँगा
क्या कुछ भी नहीं बचेगा मुझ पर कुछ समय
बाद
एक दिक्कत और सब कुछ ख़त्म
नहीं ऐसा होने नहीं दूँगा
खुद को बेहतर बना लूँगा
अगर सब कुछ ख़त्म भी हो जाए
तो ख़ाक से फिर बना लूँगा सब कुछ
कुछ भी न बचे... मैं तो बचूँगा
तो बना ही लूँगा
चाहे कुछ भी हो
- शिनाख्त
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