Ghosts of past / past regrets
sometimes the ghosts of past or the past regrets keep revisiting me ...so i wrote a poem
मेरे साथ रस्ते पर चले बहुत
अजनबियों की क्या मजाल
रहे दोस्तों से ही गिले बहुत
ऐसा क्यों किया भाई तूने
हम तुझे देखकर हिले बहुत
गुस्सा आज भी उतना ही है
जब राज़ तेरे खुले बहुत
जब किसी ने तेरी याद दिलाई
कसम आज भी दर्द खिले बहुत
दुख भी था तेरे ऐसा करने पर
मुरझा गए वो फूल जो खिले बहुत
अब देख लिये तेरे सारे रंग
अब देख लिये सिलसिले बहुत
मैं भी बैठा हूं उदास याद करके
हम तेरे साथ बेवजह झिले बहुत
अब बेतालुक्की है नफ़रत नहीं तुझसे
हम तेरे प्यार से छिले बहुत
सिर्फ खुद पर ध्यान देते हैं अब
तेरे बाद हम खुद से मिले बहुत
- शिनाख्त
There are other two poems , which i also wrote
क्या उधेड़बुन में उलझे रहते हो
कभी तो ज़ख्मों को सिया करो
जो चला गया, जाने दो, न बुलाओ
कभी तो खुशी से विदा किया करो
क्यूं इक्कठा करते हो वक़्त की अशर्फियां
कभी बेवजह भी वक्त दिया करो
...
जिनसे दिल ही न मिला
उनसे मैं भी न मिला
मिला करता था बचपन में
होश आने पर कभी न मिला
बहुत बेचैनी थी किसी की
पर किसी से सुकून ही न मिला
उन्हें मिलने की तमन्ना है मुझसे
मैं अपने ही भीतर कहीं न मिला।
...
These are theirs thing...it's not about you...let bygones be bygones..
Work on yourself...think about yourself..
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